• Wed. May 25th, 2022

बीते 35 वर्षो से हरियाणा में धारा 188 IPC है नॉन-बेलेबल अपराध -हेमंत

Byadmin

Apr 10, 2021



कानूनी संशोधन से नहीं बल्कि एक सरकारी आदेश  द्वारा  हुई गैर-ज़मानती

चंडीगढ़ – गत   वर्ष  मार्च ,2020 में   कोरोना वायरस (कोविड -19) संक्रमण के फलस्वरूप हरियाणा समेत पूरे देश में पहले  31 मई 2020 तक सम्पूर्ण  लॉकडाउन लागू  रहा जिसके  बाद  1 जून 2020  से   अनलॉकडाउन  की चरणबद्ध प्रक्रिया दौरान  भी अगर किसी कानूनी प्रावधान का सबसे अधिक मीडिया और आम लोगों में उल्लेख और जिक्र  होता रहा, तो वह हैं भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188 का.

बीते कुछ दिनों में जिस प्रकार एक बार फिर से देश के कई राज्यों में कोरोना के मामलों  में  एक बार फिर वृद्धिं हुई है जिस कारण कईं स्थानों में नाईट कर्फ्यू और अन्य कई तरह के प्रतिबन्ध लगाने बारे सक्षम अधिकारीगण द्वारा आदेश जारी किये गए  हैं  देश के हर राज्य के  गृह, स्वास्थ्य , आपदा प्रबंधन आदि विभागों के उच्च अधिकारियों एवं ज़िलों में जिलाधीशों  (डीसी, एसडीएम  ) द्वारा  जारी विभिन्न आदेशों में आम तौर पर सब में स्पष्ट   उल्लेख होता है  कि ऐसे जारी आदेशों की  उलंघना या अवहेलना करना  धारा 188 आईपीसी के अंतर्गत अपराध होगा.

 पंजाब एवं हरियाणा  हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया कि  उक्त धारा 188 में किसी सक्षम सरकारी अधिकारी द्वारा विधिवत रूप से जारी किये गए आदेशों की  जानकारी के बावजूद उन्हें न मानने अर्थात उनकी जानबूझ कर उलंघना करने पर परिस्थितियों के अनुरूप दंड के रूप में  एक माह से लेकर छः माह तक का कारवास या  जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है. उन्होंने  बताया कि मौजूदा कोरोना वायरस के संक्रम के दृष्टिगत चूँकि इसकी रोकथाम के लिए  जारी आदेशों की उलंघना करने  से समाज में  लोगो का स्वास्थ्य , सुरक्षा  और उनके जीवन पर संकट होगा, इसलिए इस पर छः माह तक के कारावास या  जुर्माना अथवा दोनों के दंड का सख्त प्रावधान लागू होगा. उन्होंने आगे बताया की दंड प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.), 1973 के पहले अनुच्छेद के अनुसार धारा 188 संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और  ज़मानती अपराध है.  संज्ञेय अपराध वह  होता है जिसमे पुलिस बिना वारंट के किसी आरोपी व्यक्ति को  गिरफ्तार कर सकती है

हालांकि  हेमंत ने  बताया कि आज से  35 वर्षो पूर्व फरवरी, 1986 में हरियाणा  सरकार के न्याय-प्रशासन विभाग  द्वारा  दंड विधि संशोधन अधिनियम, 1932 की धारा 10 की उपधाराओं  (1 ) एवं (2 ) के अंतर्गत आई.पी.सी. की धारा 188  को पूरे हरियाणा  राज्य में संज्ञेय अपराध एवं गैर ज़मानती अपराध घोषित करने सम्बन्धी एक गजट नोटिफिकेशन जारी की गयी  जिसमें हालांकि इसकी समय सीमा इसके प्रकाशन की तिथि से  एक वर्ष की अवधि के लिए ही थी लेकिन इसके  करीब आठ महीने बाद अक्टूबर, 1986  ही एक नया नोटिफिकेशन जारी कर राज्य सरकार के न्याय-प्रशासन विभाग इसे पुन: रूप से जारी कर दिया एवं नई नोटिफिकेशन में कोई समय सीमा का उल्लेख नहीं था.. तब से लेकर आज तक वह आज तक पूरे हरियाणा  में लागू  है.

ज्ञात रहे कि आज से 10 वर्ष पूर्व  चंडीगढ़ के प्रशासक  द्वारा भी ऐसी ही एक नोटिफिकेशन 25  फरवरी, 2011 को  जारी की गयी थी जो हालांकि केवल एक वर्ष के लिए थी एवं  24  फरवरी, 2012 के बाद उसे  फिर से जारी नहीं किया गया था. पडोसी राज्य पंजाब में  आज तक  पंजाब  सरकार द्वारा ऐसी कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं की गयी   है.

हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों और इस सुप्रीम कोर्ट एवं  हाई कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णयों  के अनुसार  धारा 188 आईपीसी के अपराध के अंतर्गत  पुलिस के सीधे तौर पर एफ.आई.आर. दर्ज करने में कानूनी पेच है. उन्होंने बताया की दंड प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.) 1973 की धारा 195 (1 ) के अनुसार ऐसे मामलों  में सम्बंधित  सरकारी आदेश जारी करने वाले अधिकारी या उनसे उच्च  अधिकृत अधिकारी को सम्बंधित अदालत  अर्थत न्यायिक  मजिस्ट्रेट की कोर्ट में लिखित शिकायत देनी होती है  जिस पर अदालत  उचित संज्ञान लेकर इस पर आगामी कार्यवाही कर सकती है.

हेमंत ने  बताया कि  लॉकडाउन, नाईट कर्फ्यू  एवं अन्य सरकारी आदेशों की उलंघना करने पर पुलिस आईपीसी  की धारा  269 ( लापरवाही  से कोई कार्य करना जिससे किसी बीमारी  का इन्फेक्शनन फैले ) अथवा धारा 270 (जानबूझ कर कोई कार्य कर किसी बीमारी का इन्फेक्शन घातक रूप से फैलाना ) को धारा 188 के साथ जोड़कर मामला दर्ज करती है ताकि सीधे एफआईआर दर्ज करने में कोई कानूनी पेच न हो . लिखने योग्य है कि उक्त दोनी धाराएं संज्ञेय अपराध है हालांकि जमानती हैं. धारा 269 में अधिकतम 6 महीने और धारा 270 में अधिकतम 2  वर्ष की जेल  हो सकती  है.  इसके अलावा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005  की धारा 51 से 54 और 57 एवं 58 के  तहत भी पुलिस द्वारा कार्यवाही की  जा सकती है हालांकि उसमें भी सीधे  एफआईआर दर्ज नहीं हो  सकती. पिछले वर्ष मई, 2020 में  प्रदेश के सभी थाना प्रभारियों (एसएचओ ) को कोर्ट में शिकायत डालने के लिए हरियाणा सरकार द्वारा अधिकृत किया गया है.  

Leave a Reply

Your email address will not be published.